बुद्ध जयन्ती कहां, कैसे मनाई जाती है?

बुद्ध जयंती को लेकर देशभर में उल्‍लास का माहौल देखा जा रहा है. भारत के अलावा कई अन्‍य देशों में भी बुद्ध के विचारों में आस्‍था रखने वाले लोग काफी उत्‍साहित हैं.

बुद्ध जयंती से जुड़े कुछ महत्‍वपूर्ण तथ्‍य:
-बुद्ध जयन्ती बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों का एक प्रमुख त्यौहार है. बुद्ध जयन्ती वैशाख पूर्णिमा को मनाया जाता है. पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का स्वर्गारोहण समारोह भी मनाया जाता है. इस दिन पांच सौ तिरसठ ईसा पूर्व में बुद्ध का जन्म हुआ. इस पूर्णिमा के दिन ही बुद्ध ने चार सौ तिरासी ईसा पूर्व में अस्सी साल की आयु में, देवरिया जिले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया था. भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण, ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे. ऐसा किसी अन्य महापुरुष के साथ आज तक नहीं हुआ है. इस प्रकार भगवान बुद्ध दुनिया के सबसे महान पुरुष है. इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की भी प्राप्ति हुई थी.

-बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में पचास करोड़ से अधिक लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं. हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं, इसलिए हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है. यह त्यौहार भारत, नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाइलैंड, कंबोडिया, मलेशिया, श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया तथा पाकिस्तान में मनाया जाता है.

-बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान पर हिन्दू और बौद्ध धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थल हैं. गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे. यहां उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई. तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है.

-बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध की महापरिनिर्वाणस्थली कुशीनगर में स्थित महापरिनिर्वाण मंदिर पर एक माह का मेला लगता है. यह तीर्थ महात्मा बुद्ध से संबंधित है, फिर भी आस-पास के क्षेत्र में हिंदू धर्म के लोगों की संख्या ज्यादा है और यहां के मंदिरों में पूजा-अर्चना करने वे बड़ी श्रद्धा के साथ आते हैं.

-कुशीनगर में स्थित मंदिर का महत्व बुद्ध के महापरिनिर्वाण से है. इस मंदिर का स्थापत्य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है. इस मंदिर में भगवान बुद्ध की लेटी हुई छह दशमलव एक मीटर लंबी मूर्ति है, जो लाल बलुई मिट्टी से बनी है. मंदिर का निर्माण उसी स्थान पर किया गया है, जहां से यह मूर्ति निकाली गयी थी. मंदिर के पूर्वी हिस्से में एक स्तूप है. यहां पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था. यह मूर्ति भी अजंता में बनी भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मूर्ति की प्रतिकृति है.

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-श्रीलंका और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में इस दिन को ‘वेसाक’ उत्सव के रूप में मनाते हैं जो ‘वैशाख’ शब्द का अपभ्रंश है. इस दिन बौद्ध अनुयायी घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाते हैं. विश्व भर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थनाएं करते हैं. इस दिन बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ किया जाता है. मंदिरों और घरों में बुद्ध की मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाते हैं और दीपक जलाकर पूजा करते हैं. बोधिवृक्ष की भी पूजा की जाती है. उसकी शाखाओं को हार और रंगीन पताकाओं से सजाते हैं.

-वृक्ष के आसपास दीपक जलाकर इसकी जड़ों में दूध और सुगंधित पानी डाला जाता है. इस पूर्णिमा के दिन किए गए अच्छे कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है. पिंजरों से पक्षियों को मुक्त करते हैं और गरीबों को भोजन, वस्त्र दान किए जाते हैं. दिल्ली स्थित बुद्ध संग्रहालय में इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर प्रदर्शित किया जाता है, जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहां आकर प्रार्थना कर सकें.

बुद्ध स्वामी का जीवन परिचय:
-नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच रुक्मिनदेई नामक स्थान है. वहां एक लुम्बिनी नाम का वन था. गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से पांच सौ तिरसठ साल पहले हुआ था. उनका जन्म वन में हुआ था. दरअसल जब उनकी माता अर्थात कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं तभी उन्होंने लुम्बिनी वन में बालक को जन्म दिया. बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया. सिद्धार्थ के पिता का नाम शुद्धोदन था. जन्म के सात दिन बाद ही मां का देहांत हो गया. सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया. सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद् की पढ़ाई की ही, राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली. कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हांकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता था.

-बचपन से ही सिद्धार्थ के मन में करुणा भरी थी. उससे किसी भी प्राणी का दुःख नहीं देखा जाता था. यह बात इन उदाहरणों से स्पष्ट भी होती है. घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते-दौड़ते मुंह से झाग निकालने लगता था तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता. खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था.

-शाक्य वंश में जन्मे सिद्धार्थ का सोलह वर्ष की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ हुआ. राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया. तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए. वहां पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई. दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए. पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बांधकर नहीं रख सकीं. भोग विलास में सिद्धार्थ का मन फंसा नहीं रह सका.

-सिद्धार्थ के सामने मन में वैराग्य भाव तो था ही, इसके अलावा क्षत्रिय शाक्य संघ से वैचारिक मतभेद के चलते संघ ने उनके समक्ष दो प्रस्ताव रखे थे. वह यह कि फांसी चाहते हो या कि देश छोड़कर जाना. सिद्धार्थ ने कहा कि जो आप दंड देना चाहें. शाक्यों के सेनापति ने सोचा कि दोनों ही स्थिति में कौशल नरेश को सिद्धार्थ से हुए विवाद का पता चल जाएगा और हमें दंड भुगतना होगा तब सिद्धार्थ ने कहा कि आप निश्चिंत रहें, मैं संन्यास लेकिन चुपचाप देश से दूर चला जाऊंगा. आपकी इच्छा भी पूरी होगी और मेरी भी. तब आधी रात को सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी यशोधरा और बेटे राहुल को देखा, जो सो रहे थे, दोनों के मस्तक पर हाथ रखा और फिर धीरे से दरवाजा खोलकर महल से बाहर निकले और घोड़े पर सवार हो गए. कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने अपने राजसी वस्त्र उतारे और केश काटकर खुद को संन्यस्त कर दिया. उस वक्त उनकी आयु उन्तीस साल की थी.

-बिहार में बोधगया में आज भी वह वटवृक्ष विद्यमान है जिसे अब बोधिवृक्ष कहा जाता है. इस वृक्ष को बचाने के लिए विदेशों से कई जाने-माने वैज्ञानिक हर साल इसका परीक्षण करने के लिए आते हैं और जो भी जरूरी होता है इस वृक्ष की उम्र बढ़ाने के उपाय करते हैं. इस वृक्ष को विश्व विरासत की सूची में भी शामिल किया गया है. सम्राट अशोक ने इस वृक्ष की एक शाखा को श्रीलंका भिजवाया था, वहां भी यह वृक्ष है.

-बुद्ध के धर्म प्रचार से उनके भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी तो भिक्षुओं के आग्रह पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई. बौद्ध संघ में बुद्ध ने स्त्रियों को भी लेने की अनुमति दे दी. बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगीति में संघ के दो हिस्से हो गए. हीनयान और महायान. बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है. ऐसे समय में जब भारतीय समाज अनेकानेक कुरीतियों और कर्मकांडों में फंसा अस्त-व्यक्त हो रहा था, गौतम बुद्ध ने जन्म लेकर समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए अहिंसापरक सिद्धान्तों की स्थापना की.

बुद्ध पूर्णिमा के समारोह और पूजा-विधि:
बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बुद्ध पूर्णिमा सबसे बड़ा त्योहार का दिन होता है. इस दिन अनेक प्रकार के समारोह आयोजित किए जाते हैं. अलग-अलग देशों में वहां के रीति-रिवाजों और संस्कृति के अनुसार समारोह आयोजित होते हैं.

-श्रीलंकाई इस दिन को ‘वेसाक’ उत्सव के रूप में मनाते हैं जो ‘वैशाख’ शब्द का अपभ्रंश है.

– इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाया जाता है.

– दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थनाएं करते हैं.
– बौद्ध धर्म के धर्मग्रंथों का निरंतर पाठ किया जाता है.

– मंदिरों और घरों में अगरबत्ती लगाई जाती है. मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाए जाते हैं और दीपक जलाकर पूजा की जाती है.

– बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है. उसकी शाखाओं पर हार और रंगीन पताकाएं सजाई जाती हैं. जड़ों में दूध और सुगंधित पानी डाला जाता है. वृक्ष के आसपास दीपक जलाए जाते हैं.
– इस दिन मांसाहार का परहेज होता है क्योंकि बुद्ध पशु हिंसा के विरोधी थे.

– इस दिन किए गए अच्छे कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है.

– पक्षियों को पिंजरे से मुक्त कर खुले आकाश में छोड़ा जाता है.

– गरीबों को भोजन और वस्त्र दिए जाते हैं.

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budhhaPurnima राजा का बेटा बना बौद्ध धर्म का संस्थापक, जानिये इस धर्म का इतिहास

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है. इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे. वे 563 ईसा पूर्व से 483 ईसा पूर्व तक रहे. ईसाई और इस्लाम धर्म से पहले बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई थी. दोनों धर्म के बाद यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है. इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और भारत जैसे कई देशों में रहते हैं. जानिये कैसे और किसने बनाया इस धर्म को. क्या है इसका इतिहास…

budhha Purnima history of buddhism

 

(1) बौद्ध धर्म के संस्थापक थे गौतम बुद्ध. इन्हें एशिया का ज्योति पुंज कहा जाता है.

(2) गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी, नेपाल में हुआ था.

(3) इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे.

(4) सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी मां मायादेवी का देहांत हो गया था.

(5) सिद्धार्थ की सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने उनको पाला.

(6) इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था.

 

(7) सिद्धार्थ का 16 साल की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ.

(8) इनके पुत्र का नाम राहुल था.

(9) सिद्धार्थ जब कपिलावस्तु की सैर के लिए निकले तो उन्होंने चार दृश्यों को देखा:
(i) बूढ़ा व्यक्ति
(ii) एक बिमार व्यक्ति
(iii) शव
(iv) एक संयासी

(10) सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ ने 29 साल की आयु में घर छोड़ दिया. जिसे बौद्ध धर्म में महाभिनिष्कमण कहा जाता है.

(11) गृह त्याग के बाद बुद्ध ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की.

(12) आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरू थे.

 

(13) आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रूद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.

(14) उरूवेला में सिद्धार्थ को कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा और अस्सागी नाम के 5 साधक मिले.

(15) बिना अन्न जल ग्रहण किए 6 साल की कठिन तपस्या के बाद 35 साल की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ.

(16) ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने जाने लगे. जिस जगह उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ उसे बोधगया के नाम से जाना जाता है.

(17) बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है.

(18) बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, कौशांबी और वैशाली राज्य में पालि भाषा में दिए.

(19) बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी श्रीवस्ती में दिए.

(20) इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे:
(i) बिंबसार
(ii) प्रसेनजित
(iii) उदयन

(21) बुद्ध की मृत्यु 80 साल की उम्र में कुशीनारा में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गई. जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है.

(22) मल्लों ने बेहद सम्मान पूर्वक बुद्ध का अंत्येष्टि संस्कार किया.

(23) एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बांटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया.

 

(24) बुद्ध के जन्म और मृत्यु की तिथि को चीनी पंरपरा के कैंटोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है.

(25) बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान पालि त्रिपिटक से प्राप्त होता है.

(26) बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है और इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है.

(27) बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है.

(28) तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है.

(29) बुद्ध के अनुयायी दो भागों मे विभाजित थे:
(i) भिक्षुक- बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन लोगों ने संयास लिया उन्हें भिक्षुक कहा जाता है.
(ii) उपासक- गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को उपासक कहते हैं. इनकी न्यूनत्तम आयु 15 साल है.

(30) बौद्धसंघ में प्रविष्‍ट होने को उपसंपदा कहा जाता है.

(31) प्रविष्ठ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं-
(i) बुद्ध
(ii) धम्म
(iii) संघ

(32) चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया:
(i) हीनयान
(ii) महायान

 

(33) धार्मिक जुलूस सबसे पहले बौद्ध धर्म में ही निकाला गया था.

(34) बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है.

(35) बुद्ध ने सांसारिक दुखों के संबंध में चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया है. ये हैं
(i) दुख
(ii) दुख समुदाय
(iii) दुख निरोध (iv) दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा

(36) सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही. ये साधन हैं.
(i) सम्यक दृष्टि
(ii) सम्यक संकल्प
(iii) सम्यक वाणी
(iv) सम्यक कर्मांत
(v) सम्यक आजीव
(vi) सम्यक व्यायाम
(vii) सम्यक स्मृति
(viii) सम्यक समाधि

(37) बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरांत मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त होता है.

(38) बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए 10 चीजों पर जोर दिया है:
(i) अहिंसा
(ii) सत्य
(iii) चोरी न करना
(iv) किसी भी प्रकार की संपत्ति न रखना
(v) शराब का सेवन न करना
(vi) असमय भोजन करना
(vii) सुखद बिस्तर पर न सोना
(viii) धन संचय न करना
(ix) महिलाओं से दूर रहना
(X) नृत्य गान आदि से दूर रहना.

 

(39) बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया.

(40) अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्धधर्म और जैन धर्म में समानता है.

(41) जातक कथाएं प्रदर्शित करती हैं कि बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है और पशुओं के रूप में भी.

(42) बोधिसत्व के रूप में पुनर्जन्मों की दीर्घ श्रृंखला के अंतर्गत बुद्ध ने शाक् मुनि के रूप में अपना अंतिम जन्म प्राप्त किया.

(43) सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गंधार शैली के अंतर्गत किया गया था. लेकिन बुद्ध की प्रथम मूर्ति मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी.

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इस हस्ती से गण‍ित को लगता था डर…

रामानुजन

अगर आपको मैथ्स से डर लगता है तो श्र‍ीनिवासन रामानुजन से सीखें. रामानुजन बेहद गरीब परिवार से थे. उनके पास अपने शौक पूरा करने के पैसे नहीं थे. पर वे गणित के एक सवाल को 100 से भी ज्यादा तरीकों से बना सकते थे और इसी खासियत ने उन्हें पूरे दुनिया में गणित में गुरु का दर्जा दिला दिया. विख्यात गणितज्ञ श्रीनिवासन रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को हुआ था और निधन साल 1920 में 26 अप्रैल को. सिर्फ 33 साल के अपने जीवनकाल में ही श्रीनिवासन ने वो कर दिखाया, जिसे करने में दुनिया को हजारों साल लग जाएंगे…

1)श्रीनिवासन ने गणित सीखने के लिए कभी कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं लिया था.

2)महज 12 साल की उम्र में उन्‍होंने ट्रिगनोमेट्री में महारत हासिल कर ली थी और खुद की बनाई थ्‍योरम स्‍थापित कर दी थी.

3)17 साल की उम्र में जटिल रिसर्च पूरी की, जिसमें बरनौली नंबर भी शामिल थे.

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सकारात्मक सोच:–

पुराने समय की बात है, एक गाँव में दो किसान रहते थे। दोनों ही बहुत गरीब थे, दोनों के पास थोड़ी थोड़ी ज़मीन थी, दोनों उसमें ही मेहनत करके अपना और अपने परिवार का गुजारा चलाते थे।

अकस्मात कुछ समय पश्चात दोनों की एक ही दिन एक ही समय पे मृत्यु हो गयी। यमराज दोनों को एक साथ भगवान के पास ले गए। उन दोनों को भगवान के पास लाया गया। भगवान ने उन्हें देख के उनसे पूछा, ” अब तुम्हे क्या चाहिये, तुम्हारे इस जीवन में क्या कमी थी, अब तुम्हें क्या बना के मैं पुनः संसार में भेजूं।”

भगवान की बात सुनकर उनमे से एक किसान बड़े गुस्से से बोला, ” हे भगवान! आपने इस जन्म में मुझे बहुत घटिया ज़िन्दगी दी थी। आपने कुछ भी नहीं दिया था मुझे। पूरी ज़िन्दगी मैंने बैल की तरह खेतो में काम किया है, जो कुछ भी कमाया वह बस पेट भरने में लगा दिया, ना ही मैं कभी अच्छे कपड़े पहन पाया और ना ही कभी अपने परिवार को अच्छा खाना खिला पाया। जो भी पैसे कमाता था, कोई आकर के मुझसे लेकर चला जाता था और मेरे हाथ में कुछ भी नहीं आया। देखो कैसी जानवरों जैसी ज़िन्दगी जी है मैंने।”

उसकी बात सुनकर भगवान कुछ समय मौन रहे और पुनः उस किसान से पूछा, ” तो अब क्या चाहते हो तुम, इस जन्म में मैं तुम्हे क्या बनाऊँ।”

भगवान का प्रश्न सुनकर वह किसान पुनः बोला, ” भगवन आप कुछ ऐसा कर दीजिये, कि मुझे कभी किसी को कुछ भी देना ना पड़े। मुझे तो केवल चारो तरफ से पैसा ही पैसा मिले।”

अपनी बात कहकर वह किसान चुप हो गया। भगवान से उसकी बात सुनी और कहा, ” तथास्तु, तुम अब जा सकते हो मैं तुम्हे ऐसा ही जीवन दूँगा जैसा तुमने मुझसे माँगा है।”

उसके जाने पर भगवान ने पुनः दूसरे किसान से पूछा, ” तुम बताओ तुम्हे क्या बनना है, तुम्हारे जीवन में क्या कमी थी, तुम क्या चाहते हो?”

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उस किसान ने भगवान के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ” हे भगवन। आपने मुझे सबकुछ दिया, मैं आपसे क्या मांगू। आपने मुझे एक अच्छा परिवार दिया, मुझे कुछ जमीन दी जिसपे मेहनत से काम करके मैंने अपना परिवार को एक अच्छा जीवन दिया। खाने के लिए आपने मुझे और मेरे परिवार को भरपेट खाना दिया। मैं और मेरा परिवार कभी भूखे पेट नहीं सोया। बस एक ही कमी थी मेरे जीवन में, जिसका मुझे अपनी पूरी ज़िन्दगी अफ़सोस रहा और आज भी हैं। मेरे दरवाजे पे कभी कुछ भूखे और प्यासे लोग आते थे। भोजन माँगने के लिए, परन्तु कभी कभी मैं भोजन न होने के कारण उन्हें खाना नहीं दे पाता था, और वो मेरे द्वार से भूखे ही लौट जाते थे। ऐसा कहकर वह चुप हो गया।”

भगवान ने उसकी बात सुनकर उससे पूछा, ” तो अब क्या चाहते हो तुम, इस जन्म में मैं तुम्हें क्या बनाऊँ।” किसान भगवान से हाथ जोड़ते हुए विनती की, ” हे प्रभु! आप कुछ ऐसा कर दो कि मेरे द्वार से कभी कोई भूखा प्यासा ना जाये।” भगवान ने कहा, “तथास्तु, तुम जाओ तुम्हारे द्वार से कभी कोई भूखा प्यासा नहीं जायेगा।”

अब दोनों का पुनः उसी गाँव में एक साथ जन्म हुआ। दोनों बड़े हुए।
पहला व्यक्ति जिसने भगवान से कहा था, कि उसे चारो तरफ से केवल धन मिले और मुझे कभी किसी को कुछ देना ना पड़े, वह व्यक्ति उस गाँव का सबसे बड़ा भिखारी बना। अब उसे किसी को कुछ देना नहीं पड़ता था, और जो कोई भी आता उसकी झोली में पैसे डालके ही जाता था।

और दूसरा व्यक्ति जिसने भगवान से कहा था कि उसे कुछ नहीं चाहिए, केवल इतना हो जाये की उसके द्वार से कभी कोई भूखा प्यासा ना जाये, वह उस गाँव का सबसे अमीर आदमी बना।
दोस्तों ईश्वर ने जो दिया है उसी में संतुष्ट होना बहुत जरुरी है। अक्सर देखा जाता है कि सभी लोगों को हमेशा दूसरे की चीज़ें ज्यादा पसंद आती हैं और इसके चक्कर में वो अपना जीवन भी अच्छे से नहीं जी पाते। मित्रों हर बात के दो पहलू होते हैं –
सकारात्मक और नकारात्मक, अब ये आपकी सोच पर निर्भर करता है कि आप चीज़ों को नकारत्मक रूप से देखते हैं या सकारात्मक रूप से। अच्छा जीवन जीना है तो अपनी सोच को अच्छा बनाइये, चीज़ों में कमियाँ मत निकालिये बल्कि जो भगवान ने दिया है उसका आनंद लीजिये और हमेशा दूसरों के प्रति सेवा भाव रखिये !!
24 घन्टे 365 दिन आप के लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

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जानें क्‍यों नेपोलियन को कहा जाता था ‘लिटिल कॉरपोरल’

जानिए बुलंदी छूने वाले सैन्‍य कमांडर और राजनेता नेपोलियन बोर्नापार्ट के बारे में.

1. फ्रांसीसी क्रांति के दौर में बुलंदी छूने वाले सैन्‍य कमांडर और राजनेता नेपोलियन बोर्नापार्ट का जन्‍म 15 अगस्‍त 1769 और निधन 5 मई 1821 को हुआ था.

2. उनका उपनाम नेबुइलिया था.

3. वे एलुरोफोबिया से जूझ रहे थे, ऐसी बीमारी जिसमें बिल्‍ली से डर लगता है.

4. फ्रांस में किसी भी सुअर को नेपोलियन कहना या उसका नाम रखना गैरकानूनी है.

5. उन्‍होंने 60 लड़ाईयों लड़ी और 7 हारीं.

6. नेपोलियन ने फ्रांस को ‘समानता’ का सिद्धांत दिया था.

7. उनकी लंबाई कम होने के कारण उन्हें ‘लिटिल कॉरपोरल’ भी कहा जाता था.

8. नेपोलियन ने दो शादियां की ले‍किन उनकी दोनों शादियां असफल रहीं.

नेपोलियन बोर्नापार्ट

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महाराणा प्रताप नाम है वीरता और वचन की एक अद्भुत मिसाल का

Maharana Pratap

साल 1540 में (9 मई) आज के ही रोज एक ऐसा योद्धा पैदा हुआ था जिसने अपनी जनता और साम्राज्य से लड़ने के लिए कोई समझौते नहीं किए. भारत और दुनिया का इतिहास इस शख्स को महाराणा प्रताप के नाम से जानता है. वे मेवाड़ प्रांत (अब राजस्थान का हिस्सा) के शासक थे और तब कभी न हाराए जा सकने वाले मुगलों से भिड़ गए थे.

प्रताप के नाम से मशहूर यह शख्स उदय सिंह द्वितीय और जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र थे जिन्हें उदयपुर का संस्थापक माना जाता है. दोस्त तो दोस्त उनके दुश्मन भी उनकी सैन्य क्षमता का लोहा मानते थे. अपने साम्राज्य को मुगलों के हवाले करने के क्रम में उनके संघर्षों के किस्से आज किंवदंती बन गए हैं.

आज उनकी सालगिरह के मौके पर हम खास आपके लिए लेकर आए हैं कुछ ऐसे फैक्ट्स जिन्हें पढ़ कर आपका खून दोगुनी रफ्तार से दौड़ने लगेगा…

1. महाराणा प्रताप के शारीरिक सौष्ठव की वजह से उन्हें भारत के सबसे मजबूत लड़ाके का तमगा मिला था. वे 7 फीट 5 इंच लंबे थे और 80 किलोग्राम के भाले के साथ-साथ 208 किलोग्राम की दो तलवारें भी साथ लेकर चलते थे. इसके अलावा वह 72 किलोग्राम का कवच भी पहना करते थे.

2. महाराणा प्रताप का उनके साम्राज्य का राजा बनना भी सरल नहीं था. उनकी सौतेली मां अकबर के हाथों राजा उदय सिंह की हार के बाद कुंवर जगमाल को राजगद्दी पर बिठाना चाहती थीं. अकबर ने चितौड़ और मेवाड़ किले पर भी कब्जा कर लिया था और राजपूत राजघराने ने उदयपुर में शरण ली थी. उस दौरान लंबी बहस हुईं और महाराणा प्रताप के हाथ में कमान थमा दी गई.

3. मुगलों से लड़ने के पहले प्रताप को उनकी घरेलू समस्याओं से ही निबटना पड़ा था. उनके राजगद्दी पर बैठने से पहले ही सारे राजपूत राजा मुगलों के समक्ष घुटने टेक चुके थे. अकबर ने भी महाराणा प्रताप से सीधे युद्ध में उलझने से पहले 6 संधि वार्ताओं का प्रस्ताव भेजा था.

4. पांचवी संधि प्रस्ताव के बाद महाराणा ने अपने पुत्र अमर सिंह को अकबर के दरबार में भेजा था. वे खुद वहां नहीं गए थे और इसी बात को अकबर ने नाफरमानी मानते हुए प्रताप पर हमला कर दिया.

5. महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल के लिए 1576 के हल्दीघाटी युद्ध को हमेशा याद किया जाता है. उनके पास मुगलों की तुलना में आधे सिपाही थे और उनके पास मुगलों की तुलना में आधुनिक हथियार भी नहीं थे लेकिन वे डटे रहे और मुगलों के दांत खट्टे कर दिए.

6. हल्दीघाटी की जंग 18 जून साल 1576 में चार घंटों के लिए चली. मुगलों की हालत इस जंग में पतली हो गई थी तभी उन्हें शक्ति सिंह के रूप में महाराणा का भेदिया भाई मिल गया. शक्ति सिंह ने मुगलों के समक्ष महाराणा की सारी सैन्य रणनीति और खुफिया रास्तों का खुलासा कर दिया.

7. इस पूरे युद्ध में राजपूतों की सेना मुगलों पर बीस पड़ रही थी और उनकी रणनीति सफल हो रही थी. महाराणा ने मुगलों के सेनापति मान सिंह (हाथी पर सवार) के ऊपर अपने घोड़े से हमला किया. इस हमले में हाथी से टकराने की वजह से उन्हें और चेतक को गहरी चोटें आईं. उनका घोड़ा चेतक युद्ध में उनका अहम साथी था. महाराणा बेहोशी की मुद्रा में चले गए. प्रताप के सेनापति मान सिंह झाला ने इस स्थिति से उन्हें निकालने के लिए अपने कपड़ों से उनके कपड़े बदल दिए ताकि मुगलों को चकमा दिया जा सके. चेतक महाराणा को लेकर वहां से सरपट दौड़ा लेकिन वह बुरी तरह घायल था. उसने एक अंतिम और ऐतिहासिक छलांग लगाई और महाराणा को लेकर हल्दीघाटी दर्रा पार कर गया. हालांकि, चेतक को इतनी चोटें आईं थीं कि वह नहीं बच सका.

8. इस युद्ध के बाद मेवाड़, चित्तौड़, गोगुंडा, कुंभलगढ़ और उदयपुर पर मुगलों का कब्जा हो गया. सारे राजपूत राजा मुगलों के अधीन हो गए और महाराणा को दर-बदर भटकने के लिए छोड़ दिया गया.

9. महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध में पीछे जरूर हटे थे लेकिन उन्होंने मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके. वे फिर से अपनी शक्ति जुटाने लगे. अगले तीन सालों में उन्होंने बामा शाह द्वारा दिए गए धन से 40,000 सैनिकों की सेना तैयार की और मुगलों से अपना अधिकांश साम्राज्य फिर से छीन लिया.

महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, जिजीविषा और कभी हार न मानने वाले रवैये की वजह से उन्हें भारतीय इतिहास में सम्मानपूर्वक देखा और पढ़ा जाता है. आज भी महाराणा प्रताप का जिक्र समस्त भारतीयों के लिए गर्व का विषय है.

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हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को विजेता घोषित करने की तैयारी

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की वीरता और शौर्य के किस्से बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं. मध्यकालीन इतिहास के इस सबसे चर्चित युद्ध में मेवाड़ के राणा महाराणा प्रताप और मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबार की विशाल सेना का आमना-सामना हुआ था. 1576 में हुए इस भीषण युद्ध का नतीजा अब यानी 441 साल बाद निकलने जा रहा है. जी हां, राजस्थान की सरकार इस युद्ध में महाराणा प्रताप को विजयी घोषित करने जा रही है. इतिहासकार हैरान हैं लेकिन सरकार के इसके पीछे अपने तर्क हैं.

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जयपुर से भाजपा विधायक मोहनलाल गुप्ता ने सुझाव दिया है कि यूनिवर्सिटी की किताबों में फेरबदल कर ‘हल्दीघाटी के संग्राम’ में अकबर की जगह महाराणा प्रताप को विजेता दिखाया जाए. महाराणा प्रताप की जीत के दावे इतिहासकार डॉ. चन्द्रशेखर शर्मा के शोध के आधार पर किए गए हैं. यूनीवर्सिटी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष के जी शर्मा भी इस मांग से सहमत हैं. उनका कहना है कि उन्होंने खुद इस विषय पर रिसर्च की है और पाया है कि महाराणा प्रताप और अकबर के बीच का युद्ध ड्रॉ रहा था.

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बाहरहाल ये मामला सिर्फ मांग तक सीमित नहीं रहा है. यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर राजेश्वर सिंह ने इस प्रस्ताव को हिस्ट्री बोर्ड ऑफ स्टडीज के पास भेज दिया है. बोर्ड जांच करेगा और फिर अकैडमिक काउंसिल को अप्रूवल के लिए भेजेगा. अगर अप्रूवल मिला तो किताबों में बदलाव कर हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की फौज की बजाय महाराणा प्रताप को विजेता घोषित कर दिया जाएगा.

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वैसे अकबर से बीजेपी की खुन्नस नहीं नहीं हैं. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर दिल्ली के अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप रोड रखना का सुझाव दे चुके हैं. खुद राजस्थान सरकार भी पिछले साल किताबों में अकबर का द ग्रेट टाइटल छीनकर महाराणा प्रताप को दे चुकी है.

महाराणा और अकबर की जंग..

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महाराणा प्रताप अपने सीने पर लेकर चलते थे 72 किलो का कवच

सीमित संसाधन होने के बावजूद मुगलों को नाकों चने चबवाने वाले महान योद्धा महाराणा प्रताप का आज है जन्मदिन. उनका जन्म 9 मई 1540 को हुआ था. जानिये मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप के बारे में…

1. हल्दीघाटी का युद्ध मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच 18 जून, 1576 ई. को लड़ा गया था. अकबर और महाराणा प्रताप के बीच यह युद्ध महाभारत युद्ध की तरह विनाशकारी सिद्ध हुआ था.

2. ऐसा माना जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे. मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी.

3. महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था.

4. आपको बता दें हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक. इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे.

5. कहते हैं कि अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए 6 शान्ति दूतों को भेजा था, जिससे युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म किया जा सके, लेकिन महाराणा प्रताप ने यह कहते हुए हर बार उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया कि राजपूत योद्धा यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता.

6. महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियां की थीं. कहा जाता है कि उन्होंने ये सभी शादियां राजनैतिक कारणों से की थीं.

7. महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था.

8. महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह ही उनका घोड़ा चेतक भी काफी बहादुर था.

9. बताया जाता है जब युद्ध के दौरान मुगल सेना उनके पीछे पड़ी थी तो चेतक ने महाराणा प्रताप को अपनी पीठ पर बैठाकर कई फीट लंबे नाले को पार किया था.आज भी चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है.

10. हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लडने वाले सिर्फ एक मुस्लिम सरदार था -हकीम खां सूरी.

11. मेवाड़ को बचाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ने वाले महाराणा प्रताप 6 बार अकबर को बादशाह मानकर मेवाड़ में राज चलाने की पेशकश ठुकराई. उन्हें किसी ‘विदेशी’ का राज स्वीकार नहीं था.

12. हल्दीघाटी की लड़ाई में उनका वफादार घोड़ा चेतक गंभीर रूप से जख्मी होने की वजह से मारा गया. लेकिन इस शहादत ने उसे खासी शोहरत दिलाई.

13. महाराणा प्रताप के 17 बेटे और 5 बेटियां थीं. महारानी अजाब्दे से पैदा हुए अमर सिंह उनके उत्तराधिकारी बने.

14. उनके अपने ही बेटे ने दगा दिया और महाराणा प्रताप की मौत के बाद मेवाड़ अकबर को सौंप दिया.

maharana pratap birthday

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तो ये थे महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहे गोपाल कृष्ण गोखले महान स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ भी थे. उन्होंने गांधी जी को देश के लिए लड़ने की प्रेरणा दी. वो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे.

अंग्रेजों के अत्याचार पर भारतीयों को कोसते हुए उन्होंने कहा कि तुम्हें धिक्कार है, जो अपनी मां-बहनों पर हो रहे अत्याचार को चुप्पी साधकर देख रहे हो. इतना तो पशु भी नहीं सहते.

जानें उनसे जुड़ी 10 बातें –

1. गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के कोहट में हुआ था. उनके पिता क्लर्क कृष्ण राव पेशे से क्‍लर्क थे.

2. पढ़ाई के दौरान अच्‍छे प्रदर्शन के लिए उन्हें सरकार की ओर से 20 रुपये की छात्रवृत्ति मिलनी शुरू हुई थी .

3. शिक्षा के प्रति उनका झुकाव शुरू से था जिसके चलते उन्‍होंने भारतीय शिक्षा को विस्‍तार देने के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्‍थापना की.

जब साउथ अफ्रीका में गांधी से हुई मुलाकात

4. उन्होंने इस कालेज में शिक्षण के साथ ही आजादी के लिए राजनीतिक गतिविधियां भी चलाईं.

5. उनका मानना था कि स्‍वतंत्र और आत्‍मनिर्भर बनने के लिए शिक्षा और जिम्‍मेदारियों का ज्ञान जरूरी है.

6. गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्‍ट्रीय क्रांगेस के जाने-माने चेहरे थे. उन्‍होंने लगाता ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई. अपनी प्रतिभा के दम पर वे आगे चलकर जननेता के रूप में प्रसिद्ध हुए.

7. उन्‍होंने जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ भी आंदोलन चलाया था. 1912 में गांधी जी के आमंत्रण पर वह खुद भी दक्षिण अफ्रीका गए और वहां जारी रंगभेद का विरोध किया.

प्रेरणादायक नेता थे गोपाल कृष्ण गोखले

8. गांधी जी ने अपनी आत्‍मकथा में गोखले को अपना राजनीतिक गुरु बताया था. लेकिन वह सिर्फ राष्ट्रपिता ही नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना के भी राजनीतिक गुरु थे.

9. अंग्रेजों के अत्‍याचार पर भारतीयों से कड़े शब्‍दों में उन्‍होंने कहा था ‘तुम्‍हें धिक्‍कार है, जो अपनी मां-बहन पर हो रहे अत्‍याचार को चुप्‍पी साधकर देख रहे हो. इतना तो पशु भी नहीं सहते हैं.’

10. उनका निधन 19 फरवरी 1915 को हुआ.

 gopal krishna gokhale
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HTC के इस शानदार स्मार्टफोन पर मिल रही है 10 हजार रुपये की छूट

भारत में HTC U Ultra और HTC U Play को फरवरी में लॉन्च किया गया था. इसकी कीमत क्रमश: 59,990 और 39,990 रुपये रखी गई थी. लॉन्च के कुछ महीने बाद ही अब कंपनी ने HTC U Play की कीमत में 10,000 रुपये की कटौती कर दी है और अब ये स्मार्टफोन 29,990 में सेल के लिए उपलब्ध है. ग्राहक इसे एक्सक्लूसिव तौर पर अमेजन इंडिया से खरीद सकते हैं.

HTC U Play के ग्राहक अमेजन से सफायर ब्लू और ब्रिलियंट ब्लैक कलर ऑप्शन में खरीद सकते हैं. इसके साथ कुछ ऑफर्स भी दिए गए हैं जिसे ग्राहक वेबसाइट पर जा कर देख सकते हैं.

ताइवान की कंपनी ने HTC U Play को 4GB रैम + 64GB स्टोरेज वैरिएंट में भारत में लॉन्च किया था. इस स्मार्टफोन में गोरिल्ला ग्लास के साथ 5.2-इंच फुल-HD (1080×1920 पिक्सल) और सुपर LCD डिस्प्ले मौजूद है. इसमें कंपनी ने ऑक्टा कोर MediaTek Helio P10 प्रोसेसर दिया है.

इसके रियर में BSI सेंसर , ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाइजेशन, PDAF, डुअल टोन LED फ्लैश, f/2.0 अपर्चर के साथ 16 मेगापिक्सल का कैमरा दिया गया है. वहीं इसके फ्रंट में अल्ट्रा पिक्सल मोड, BSI सेंसर, f/2.0 अपर्चर और 28mm फोकल लेंथ के साथ 16 मेगापिक्सल का ही सेंसर दिया गया है.

HTC U Play के इंटरनल स्टोरेज को 2TB तक बढ़ाया जा सकता है. कनेक्टिविटी के लिए इस स्मार्टफोन में VoLTE के साथ 4G LTE, GPS/ A-GPS, Bluetooth v4.2, Wi-Fi 802.11ac, NFC, DLNA, Miracast, HTC Connect और USB 2.0 Type-C मौजूद है. HTC U Play में फास्ट चार्जिंग सपोर्ट के साथ 2500mAh की बैटरी दी गई है.

 

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