हंस किसका

सिद्धार्थ और कृष्णा दो दोस्त थे | सिद्धार्थ रायगढ़ के राजा राव माधव का बेटा था | और कृष्णा उस राज्य के सेनापति सुरसेन का बेटा था | एक दिन सिद्धार्थ और उसका दोस्त कृष्णा दोनों राजमहल के सरोवर के पासघूम रहे थे घुमते घुमते  कृष्णा ने अचानक देखा की उस का मित्र कही गायब है | और वह उसे खोजने लगा तभी उसने देखा की एक हंस पास की झारी मै घायल चटपटा रहा है उसने उसे उठाया उसके सरीर से तीर निकला और पास से कुछ जरी बूटी तोर कर उस के घाव पर लेप लगाया | हंस का दर्द भी कम हो गया तभी उसका दोस्त सिद्धार्थ वहा आ गया और उसे कहने लगा की इस हंस का सीकर मई नै किया है इसलिय ये हंस मेरा है| कृष्णा ने कहा की नहीं इस हंस को मई नै बचाया है यह मर रहा था इसलिए यह हंस मेरा है| दोनों मई झगरा सुरु हो गया तभी जब कोई नतीजा नहीं निकला तो पास खरे सनिको ने सलाह दी की आप दोनोकल राजा के दरबार मै जाइये गा महाराज ही फैसला कर दंगे  की हंस किसका है | दोनों ही सहमत हो गए दुसरे दिन दोनों राव माधव के दरबार मै पहुचे और सारा हाल कह सुनाया | सिधार्ष कह रहा था की इस हंस का सीकर मैने किया ही इस  लिए ये हंस मेरा है | और कृष्णा कह रहा था की इस हंस को मई नै बचाया नही तो ये मर जाता इसलिए ये हंस मेरा है| राजा ने दरबार मई उपस्थित अन्य दरबारियों से पूछा तो कुछ ने सिधार्ध और कुछ ने कृष्ण के पक्छ मई सहमती जताई | जब कोई निर्णय नहीं निकला तो महाराजा राव माधव ने बहुत सोच कर अपना फैसला मंत्री के बेटे कृष्णा के पक्छ मै सुनाया | तब सरे दरबारी सोंच  मै  पर गए | तब राजा ने कहा देखो इस संसार मै मरने वाले से जादा हक़ बचने वाले का होता है | सिद्धार्थ नै उस हंस को अपने तीर से उसे घायल किया लेकिन कृष्णा नै उसे बचाया | अगेर कृष्णा उस हंस को नहिओ बचाता तो वह मर जाता इसलिए उस हंस पर सिर्फ कृष्णा का अधिकार है | और हंस कृष्णा का है |

शिक्षा=>इस कहानी से हमे यह सिख मिलती है की किसी भी छोटे बरे जीव जंतु

पक्छी, या अन्य किरो मकोरो को कभी मरना नहीं चाहिए| अगेर वे

किसी संकट मई हो तो उन्हे  बचाना चाहिए|

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