स्वामी विवेकानन्द के विचार

एक विचार ले लो | उसी के अपने जीवन को बनाओ ;

उसी को सोचो , उसी का स्वप्न देखो और उसी पर अवलम्बित रहो |

अपने मस्तिष्क , मांसपेशियों, शरीर के प्रत्येक भाग को उसी विचार से ओतप्रोत होने दो और अपने सब विचारों को अपने से दूर रखो | यही सफलता का रास्ता है ||

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आत्मसंयम

* पीठ पीछे किसी की निंदा करना पाप है | इससे पूरी तरह बचकर रहना चाहिए | मन में कई बातें आती है परन्तु उसे प्रकट करने से राई का पहाड़ बन जाता है | यदि क्षमा कर दो, तो उन बातों का अन्त हो जाता है |

* यदि तुम्हारे पास कोई व्यर्थ वाद – विवाद के लिए आये , तो नम्रता पूर्वक पीछे हट जाओ |…..

* यदि आत्मा के जीवन में मुझे आनंद नहीं मिलता , तो क्या में इन्द्रियों के जीवन से आनंद पाँऊगा ? यदि मुझे अमृत नही मिलता तो क्या मैं गढ़ढ़े के पानी से प्यास बुझाँऊ ?…. सुख आदमी के सामने आता है तो दुःख का मुकुट पहन कर जो उसका स्वागत करता है उसे दुःख का भी स्वागत करना पड़ता है |

* यदि किसी को राजनितिक और सामाजिक स्वंत्रता चाहे मिल जाय , पर वह यदि वासनाओं और इच्छाओं का दास है , तो सच्ची स्वंत्रता का शुद्ध आनंद वह नही जान सकता |

* जिस पुरुष ने स्वयं पर आधिकार प्राप्त कर लिया है , उसके ऊपर बाहर की कोई भी चीज अपना प्रभाव नहीं डल सकती | उसके लिए किसी भी प्रकार की दासता शेष नही रह जाता | उसका मन स्वंतत्र हो जाता है | और केवल ऐसा ही पुरुष संसार में रहने योग्य है |

* तुम्हें एक स्वामी के समान कार्य करना चाहिए , न की एक दासी की तरह | कर्म तो निरन्तर करते रहो , परन्तु एक दास के समान मत करो | यही आत्मसंयम है ||

 

 

 

 

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