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सास और बहू |

सुनंदा अपने पिता की इकलौती बेटी थी, नाम के मुताबिक देखने में भी बहुत सुन्दर थी | जब वह अपने ससुराल गयी तो उसे उसके मुताबिक ही सब कुछ मिला | किन्तु आज कल की लड़कियों को अधिक टोकना समझाना अपने मन के मुताबिक चलाना सासू माँ को अब कहाँ रह गया | एक कहावत हैं – जो किया बहू से टकरार, खो दिया उसने बेटे का प्यार|

इस कहानी के मुताबिक सुनंदा की सास सुनंदा को हमेशा समझाती बहू ऐसा करो, ऐसा न करो, नई नवेली बहू को थोड़े ही दिनों में अपनी सासू माँ से चिढ़ पैदा होने लगी| इस प्रकार यह सिलसिला आगे की ओर बढ़ा | एक दिन सुनंदा के घर कुछ मेहमान आने वाले थे, सासू माँ बोली बहू आज कुछ अच्छी अच्छी व्यंजन बनाओ और मेहमानों के लिये चाय नास्ता का इंतजाम भी अच्छी तरह से होनी चाहिये| बस क्या था, इतना सुनते ही सुनंदा गुस्से से लाल हो गयी |  सुनंदा अब अपनी चाल  चलना शुरू की सास जैसा कहती, वह ठीक उसके विपरीत करती सास भी पुरानी कहावत के मुताबिक बहू को उसके माता-पिता को गाली देना कोसना शुरू कर दिया |

दोनों सास बहू में आना कानी हमेशा चलता रहता | एक दिन सुनंदा अपने पिता के घर रोती पिटती पहुँच गई | और अपने पिता से बोली पिताजी आप तो डॉक्टर हो मुझे कुछ ऐसा दावा के रूप में जहर दो जिसे खिलाकर में बुढिया को मार सकूँ | क्योंकि वह मुझे गन्दी – गन्दी  गलियां  देती हैं| इस पर पिता जी कुछ सोंचते हुए बोले, बेटी अगर तु अपनी सास को जहर खिलाओगी तो पुलिस वाले  तुम्हें पकड़कर    ले जायेंगे| इस लिये मैंने एक युक्ती सोंची हैं| कि हर रोज, अगर एक महीने तक यह दवा के रूप में जहर अपनी सास को खाना में मिलाकर खिलाती रहोगी तो कोई समझेगा भी नहीं और दवा धीरे- धीरे अपना असर करता हुआ एक महीने में उसे मार डालेगा, वह मर भी जायेगी और तु बच भी जाऐगी   पर खाना हर रोज प्यार से खिलाना |

दवा लेकर सुनंदा ख़ुशी – ख़ुशी अपने घर आयी | और पिता के कहे मुताबिक अपना काम शुरू कर दी| अब सास जो कुछ भी कहती उसे वह मानती और उलट कर जवाब भी नहीं देती क्योंकि वह जानती थी, कि बुढ़िया तो अब महीनें भर की मेहमान हैं | उसके बाद वह चैन से रहेंगी| अब हर रोज वह प्यार से चुटकी भर जहर खाना में मिलाकर प्यार से,  माँ जी को देती थी| माँ भी समझती शायद इसके माता-पिता ने इसे समझाया बुझाया हैं| इस लिये यह लड़ना झगड़ना बन्द कर दी हैं| अब माँ जी भी बहू की खुब प्रसन्नसा किया करती थी| और बहू भी प्रसन्नसा सुन कर प्यार से बाते किया करती थी| इस प्रकार महीना आते आते दोनों सास बहू में इतना प्यार बढ़  गया की बहू अब अपनी सास को खोना नहीं चाहती थी| एक दिन फिर उसी प्रकार सुनंदा रोती पिटती अपने पिता के पास पहुंची|  पिता जी बोले अब क्या  हुआ , सुनंदा बोली पिताजी अब क्या होगा में अपने सास को खोना नहीं चाहती | अब मुझे कोई ऐसा दवा दो  जो मेरी माँ जी को दिया हुआ | जहर का असर काट सके इस पर पिताजी  हँसते हुए बोले बेटी तुम रोना धोना बंद करो और ख़ुशी से रहो , जो दवा मैने तुम्हे दिया वह कोई जहर नहीं था वह जहर उतरने की दवा थी| अगर में ऐसा नहीं  किया होता तो तुम शायद आज नहीं सुधारी होती| बेटी इसी प्रकार यदि तुम अपनी सास के साथ अच्छे से रहोगी तो वह भी  तुम्हें अपनी बेटी के सामान प्यार करेगी | फिर सास और बहू ख़ुशी – ख़ुशी प्यार से रहने लगे |

1 thought on “सास और बहू |”

  1. Honney says:

    Your thnnikig matches mine – great minds think alike!

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