विधार्थियों , इन्हें अपनाओ और सदा सुख पाओ (( भाग -2 ))

विधाथियों ! न बुरा सुनना , न बुरा देखना , और न ही बुरा बोलना  | इस सावधानी को अपनाने से तुम्हारे जीवन में सफलता और मन में हर्षोल्लास बना रहना निश्चित है | जिसका चरित्रिक पतन हो जाता है उसका मन कभी भी संत और संतुष्ट नहीं होता क्योंकि उसकी अंतर आत्मा उसे हमेशा ही लानत देती और कोसती रहती है | उसके चित में हमेशा ही ग्लानी बनी रहती है , वह कभी भी सुख का अनुभव नहीं करता | अतः विधाथियों आज अपने मन में एक दृढ संकल्प करो कि जो दिन बीत गये सो बीत गए ! परन्तु अब हम अपने जीवन पुस्तक का नया अध्याय खोलेंगे और बुराई को जीवन में कभी पास नहीं आने देंगे | हम किसी के कहने पर लग कर , किसी के प्रभाव या दवाब में आकर आत्मा को नहीं बेच डालेंगे या अपने चरित्र को नहीं लुटा डालेगें क्योंकि यदि हमारा चरित्र ही चला गया तो बंकि हमारे पास क्या रह जाएगा, जिससे की हम अपना मस्तक उठा सकें ?

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विधाथियों ! विधा अध्ययन के दिन जीवन के प्रांरभिक निर्माण के दिन होते हैं | इन दिनों मनुष्य को जो संस्कार बनते हैं , उन्हीं पर आगे उनके जीवन की मंजिल खड़ी होती चली जाती है | इसी काल में जो आदत पड़ती है , वे पक्की होती चली जाती हैं | जैसे की कोमल पौधे को लाठी का सहारा देकर खड़ा किया जाता है ताकि उसका तना टेढ़ा ना हो और वृक्ष बने तो वह सीधा हो , वैसे ही विधार्थी जीवन भी शीर्घ प्रभावित होने वाला जीवन होता है , इसमें ऐसे शिक्षा की जरूरत होती है जो उसमें ठीक आदत डालें और ठीक संस्कारों का निर्माण कर सकें |

अतः विधार्थियों आप नैतिक शिक्षा अथवा मानवीय मूल्यों पर भी ध्यान दो क्योंकि उसके बिना तो मनुष्य – चोला होने पर भी जीवन पाशविक प्रवृतियों वाला होता है |

विधार्थियों किसी भी कर्म को पुनरावृर्ती करने पर आदत दृढ होती है | यदि मनुष्य एक बार क्रोध करता है तो उसमें दोबारा क्रोध करने की आदत हो जाती है | और दोबारा करने से तीसरी बार करने की उसमें और अंतर्वेग आता है और इस प्रकार उसके संस्कार पक्के होते जाते हैं |

अतः ध्यान देना आवश्यक है कि प्रांरभ से ही अच्छी आदतों का निर्माण हो और कुप्रवृत्तियां बने ही नहीं ताकि आगे चल कर उनसे  छुटकारा पाने के लिए मेहनत न करनी पड़े |

विधार्थियों ! आपको सद्गुणों एवं मानवीय प्रवृति का ज्ञान प्राप्त करते हुए नैतिक नियमों की स्थपना पर भी ध्यान देना है , बुराई को प्रारंभ से ही मिटाने में बुद्धिमानता है अतः इस नीति को अपनाओ और सदा सुख पाओ |||

 

 

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