वर्तमान परिवेश और स्त्री

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो”

“विश्वास नग पग ताल में

पियूष स्रोत – सी बहा करो

जीवन के सुन्दर समतल में |”

जयशंकर प्रशाद जी ने कहा है कि नारी का इस स्रष्टि में आगमन पियूष की जीवनदायिनी यात्रा से कम नहीं है | जिस प्रकार से तार के बिना वीणा और धुरी के अभाव में रथ का पहिया व्यर्थ है उसी प्रकार से नारी के बिना यह संसार नीरस है | यह सत्य हमारी भारतीय संस्कृति के वैदिक युग में ही उद्घाटित हो चुका था | इस काल में नारी का महत्व पुरुष से कतई  कम नहीं था | नारी को भी सभी अधिकार प्राप्त थे जो पुरुष को थे | नारी शिक्षक, मुनी, आदि  पदों पर आसीन थी | इसलिए मनुजी ने अपनी स्मृति में लिखा है –

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”

अर्थात जहाँ नारी की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते है |

मध्ययुग में मुसलमानों के आक्रमण के साथ साथ नारी अपनी गरिमा खोकर पुरुषों के भोग विलास का साधन बन गई | समय परिवर्तित हुआ | नारी की स्थिति में पुनः सुधार हुआ | प्राचीन काल   में हमारे समाज में सती प्रथा प्रचलित थी जिसमें पुरुषों के मरने के बाद स्त्रियों को जला दिया जाता था अथवा वे स्वयं      जल जाती थी | विधवाओ को पुनः विवाह करने का अधिकार नहीं था, बालविवाह आदि प्रथाएँ प्रचलित थीं | जिससे स्त्रियो की स्थिति और दयनीय बन गई थी | आज भी समाज से ये समस्याएँ पुरी तरह खत्म नहीं हुई हैं | दहेज प्रथा आर्थिक विपन्नता के कारण कन्याभ्रूण हत्या की जाती है | जो हमारे समाज के लिए एक अभिशाप बन गई है | आज के परिवेश में भी स्त्रियों को दहेज के लिए प्रतारित किया जा रहा है |

तभी तो हमारे देश के राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त को लिखना –

“अबला जीवन हाय ! तुम्हारी यहीं कहानी |

आँचल में है दूध और आँखों में पानी ||”

आज स्वंतत्र भारत में स्त्रियों, पुरुषों के साथ सभी क्षेत्रों में जूड़ी है | ऐसा कोई क्षेत्र नहीं हैं, जहाँ पर नारी का पदार्पण नहीं हुआ हो | वे डॉक्टर हैं , वकील हैं , न्यायाधीश हैं , कुशल अभिनेत्री हैं , राजनेता हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में वे अपनी अग्रणीय भूमिका निभा रही हैं | कहने का मतलब यह है कि, आज स्त्री के प्रगति के सभी द्धार खुले हैं | वे स्वंतत्र वातावरण में साँस ले रही हैं | भारतीय सविंधान में स्त्रियों को वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जो पुरुषों को हैं |

तथापि आज परिवेश में भी वे समस्याएं व्याप्त हैं जो प्राचीन काल में थी | आज भी परिवार में स्त्रियों को दुय्यम स्थान दिया जाता है | दहेज प्रथा आज भी विधमान है | परिवार में लड़का – लड़की के बीच भेद किया जाता है |

हमारे देश के समाज सुधारकों राजा राममोहन राय , दयानंद सरस्वती ,महर्षि कवे   आदि के करण स्त्री शिक्षा का प्रचार एवं प्रशार हुआ है , जिससे आसानी से स्त्रियों में शिक्षा का प्रशार संभव हुआ और आज स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं | वर्तमान परिवेश में स्त्रियाँ सभी प्रकार की शिक्षा ग्रहण कर रही हैं | आज पाश्चात्य जगत से स्त्रियाँ अधिक प्रभावित हुई हैं | वह सब कुछ पा लेना चाहती हैं जो कुछ समय पूर्व उनके लिये स्वप्न मात्र था , वह अपने रहन – सहन , वेशभूषा ,व्यवसाय ,जीवन –दशर्न  सभी का स्वंतत्रता से उपभोग कर रही हैं |

नारियो को आर्थिक स्वंतत्रता प्राप्त होने से वह अब अपने जीवन निर्वाह के लिए पुरुषों पर आश्रित नहीं हैं | आज पर्दा प्रथा ख़त्म हो गई है | वर्तमान परिवेश में स्त्रियां अपने –आप स्वयं का और अपने परिवार का जीवन निर्वाह कर सकती हैं | इस वर्तमान परिवेश में नारी की इस  स्थिति से  पुरुष समाज में थोरी सी तिलमिला हट भी हुई हैं | वह स्त्रियों की तीव्र आलोचना कर रहा है | उनको लगता की नारी जगत उनको अधिकारों को हथिया रही है |

हमें यह नहीं भूलना चहिये की , नारी सृष्टी का एक अप्रतिम सौंदर्य है |  स्थिति उसकी बेहतर होगी तो समाज का भी विकास  होगा | वह जगत – जननी हैं ,करुणा, दया, ममता की प्रतिमा है | वह किसी की बेटी , पत्नी , माँ और बहन है | नारी को भी अपने परम्परागत मूल्यों को नहीं भूलना चहिए , जो वर्तमान परिवेश में हो रहा है , उसे हमेशा यह स्मरण रखना चहिए की नारी का जीवन एक दर्पण की तरह होता है जो कभी टूट जाता हैं , तो जुट नहीं पाता |

नारी शक्ति स्वरूपा है | एक ऐसी शक्ति जो भूलों को राह दिखाती है और अपने सौम्य आचरण से संसार में सत्यम , शिवम् सुन्दरम् का सुधावर्षण करती है |

 

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