रोटी का सफर

मां मुझे रोटी दो। अरे बेटा आकर ले जाओ। ठीक है। अक्षत ने कहा। पर यह क्या हुआ, जैसे मैं रोटी लेने जा रहा था, रोटी ने मुझे हाथ हिलाकर अपनी ओर आकर्षित किया और कहा- अरे अक्षत, मुझे खाने से पहले मेरी बनने की कहानी तो सुन लो।

अक्षत ने कहा- ठीक है सुनाओ।

मेरे जन्म की कहानी गेहूं से शुरू होती है। किसान दादा ने मुझे उगाया और मैं बड़ा होता गया। अपने परिवार वालों के साथ रहता था। पर एक दिन क्या हुआ, किसान दादा ने मुझे मेरे परिवार वालों से अलग कर दिया और एक अंधेरी कोठरी में डाल दिया। पर सच कहूं मैं बहुत डर गया था।

फिर एक दिन मैंने खुद को एक ठेले पर पाया और मैं सोचने लगा कि कोई मुझे लेने कब आएगा और इस उदासीन जगह से ले जाएगा। तभी तुम्हारी मां दूसरी ओर से आईं, मुझे खरीदा और घर पर ले आईं और एक लंबे-चौड़े डिब्बे में डाल दिया।

एक दिन तुम्हारी मां ने मुझे उठाया और खूब ठंडे पानी से नहला दिया। कितना ठंडा पानी था पर तुम्हारी मां बहुत अच्छी है। उन्होंने मुझे झट से उठाया और अच्छी गरम-गरम धूप में मुझे सुखाया और ठंडी में तो कितना अच्छा लगता है धूप में सोना? है न!

फिर एक दिन मां मुझे एक जगह लेकर गई, उधर तुम्हारी मां ने मुझे एक चक्की में डाल दिया। पर तुम्हारी मां बहुत अच्‍छी हैं। मुझे लगा था कि वे मुझे घुमाने लाई हैं, पर यहां तो उलटा ही हो गया। उसके बाद मैं चक्की में इतना घूमा कि मुझे तो चक्कर आने लगे। पर अरे! यह क्या हुआ? मैं तो एकदम गोरा हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे खूब सारा पावडर लगाकर आया हूं।

फिर मां मुझे अपने घर लाई और उन्होंने मुझे ठंडे पानी के साथ मिलाया और उसके बाद मुझे बेलन से इतना चपटा किया कि मुझे ऐसा लगा कि मैंने दुबले होने की दवा ले ली हो। फिर तुम्हारी मां ने मुझे गरम तवे पर डाला, अरे बाप रे! मेरे पैरों में चटके ही लगे जा रहे थे फिर उन्होंने मुझे आग पर डाला।

मैं तो जलने लगा फिर मां ने मेरे ऊपर बहुत सारा घी डाला। आ… हा… हा…। घी की खुशबू से तो मेरा दिल खुश हो गया, फिर मैं तुम्हारी थाली में आई। मुझे खुशी है मैं अपने परिवार के लिए तो नहीं, किसी इंसान के पेट भरने के काम तो आई।

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