भारत के बारे में स्वामी विवेकानन्द के विचार

समस्त संसार हमारी मातृभूमि का ऋणी है | किसी भी देश को लीजिए , इस जगत में एक भी जाति ऐसा नही है , जिसका संसार उतना ऋणी हो , जितना कि वह यहाँ के धैर्यशील और विनम्र हिन्दुस्तान का है |

अनेकों के लिए भारतीये विचार , भारतीये रीति – रिवाज , भारतीये दर्शन , भारतीये साहित्य प्रथम द्रष्टि में ही अच्छे नहीं लगते , पर यदि वे सतत प्रयत्न करें , पढ़े तथा इन विचारों में निहित महान तत्वों से परिचित हो जाएँ , तो परिणामस्वरूप उनमें से 99 प्रतिशत आनंद से विभोर होकर उन पर मुग्ध हो जाएँगे |

मेरी बात पर विश्वास कीजिए | दुसरे देशों में धर्म की केवल चर्चा ही होती है | पर ऐसे धार्मिक पुरुष , जिन्होनें धर्म को अपने जीवन में परिणित किया है | जो स्वयं साधक हैं , केवल भारत में ही है |

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मैंने कहा कि अभी भी हमारे पास कुछ ऐसी बातें हैं, जिनकी शिक्षा हम संसार को दे सकते है | यही कारण है कि कई दिनों तक अत्याचारों को सहने ,लगभग हजार वर्ष तक विदेशी शासन में रहने और विदेशीयों द्वरा पीड़ीत होने पर भी यह देश आज तक जीवित रहा है |उसके अभी भी अस्तित्व में रहने का कारण भी यही है कि वह सदैव और अभी भी ईश्वर का आश्रय लिये हुए है , तथा धर्म एवं आध्यात्मिकता के अमूल्य भण्डार का अनुसरण करता आया है |

हमारे देश में अभी भी धर्म और आध्यात्मिकता विधमान हैं | पर याद रखो , यदि तुम इस आध्यात्मिकता का त्याग कर दोगे और इसे एक ओर रखकर पश्चिम की सभ्यता की पीछे भागोगे , तो परिणाम यह होगा कि तीन पीढ़ियों में तुम एक मृत जाति बन जाओगे ; क्योंकि इससे राष्ट्र की रीढ़ टूट जाएगी , राष्ट्र की वह नींव जिस पर इसका निर्माण हुआ है , नीचे धँस जाएगी और इसका फल सर्वांगीण विनाश होगा |

भौतिक शक्ति का प्रत्यक्ष केंद्र यूरोप , यदि आज अपनी स्थिति में परिवर्तन करने में सतर्क नहीं होता , यदि वह अपनी आदर्श नहीं बदलता  और अपने जीवन को आध्यात्मिकता पर आधारित नहीं करता , तो पचास वर्ष के भीतर वह नष्ट – भ्रष्ट होकर धूमिल हो जाता और इस स्थिति में उसे बचानेवाला यदि कोई है तो वह उपनिषदों का धर्म ही है |

उपनिषदों का सत्य तुम्हारे सामने है | उन्हें स्वीकार करो , उनके अनुसार अपना जीवन बनाओ , और इसी से शीघ्र ही भारत का उध्दार होगा |

क्या तुम्हें खेद होता है कि लाखों मनुष्य आज भी भूख की ज्वला से तरप रहे हैं ? क्या तुम अनुभव करते हो की अज्ञानता सघन मेघों की तरह इस देश पर छा गई है ? क्या इससे तुम्हें दुःख होता है ? क्या इससे तुम छटपटाते हो ? क्या इससे से तुम्हारी नींद उचट जाती है ? क्या सर्वनाश के इस भावना से तुम बेचैन हो ? और क्या इससे तुम्हें घुटन होती है ? तुम्हें क्या ऐसा हुआ है – देश भक्त होने की यही है प्रथम सीढ , केवल प्रथम सीढ |

आओ , मनुष्य बनो | अपनी संकीर्णता से बाहर आओ और अपना द्रष्टिकोण व्यापक बनाओ |  क्या तुम अपने देश से प्रेम करते हो ? क्या तुम मनुष्य से प्यार करते हो ? तो आओ हम उच्चतम और श्रेष्ठतम वस्तुओं के लिए प्राणपण से यत्न करों | चलो , आगे बढो, आगे बढो , और हमेसा आगे बढ़ते रहो ||      

(स्वामी विवेकानन्द)

 

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