बीज

 

किसी नदी के किनारे एक बीज पड़ा था |

वह बहुत छोटा था , वहाँ एक चिड़ीया आई |

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वह चोंच मरकर बीज खाने लगी |

तभी बीज बोला –

“रुकी रहो , रुकी रहो , जमीन में गड़ने दो |

डाल पात होने दो , तभी मुझे खाना ||” 

चिड़ीया चीं- चीं करते उड़ गई |

कुछ दिन पानी बरसा | पानी और धुप पाकर बीज में अंकुर फुटा |

कुछ दिन बाद वहाँ एक बकरी आई |

कोंपले देखकर उसके मन में पानी भर आया |

कोंपले ने कहा –

“ रुकी रहो , रुकी रहो , जड़ को गहरा हो जाने दो |

पानी और खाद से बड़े होने दो , तभी खाना ||”

बकरी यह सुनकर में – में करती वहाँ से चली गई |

थोरे दिन के बाद बीज एक छोटे से पौधा बन गया |

एक दिन गाय वहाँ आई |

उसने पौधे को खाने के लिये मुहँ खोला |

इतने में पौधे ने कहा –

“ रुकी रहो ,रुकी रहो , डाल पात होने दो |

हवा, पानी , से बड़े होने दो , तभी मुझे खाना ||”

यह सुनकर गाय रंभाती हुई चली गई |

बहुत दिन बीत गए | उसकी डालें बड़ी हो गई | एक दिन फिर वहाँ चिड़ीया , गाय और बकरी आई |

उन्होंने ने एक दुसरे से पूछा – वह छोटा पौधा कहाँ गया ?

तभी पेड़ बोल उठा – मैं ही बीज हूँ …..मैं ही अंकुर हूँ …… मैं ही पौधा हूँ ….और अब मैं पेड़ हूँ |

अब मैं तुम सब के काम आ सकती हूँ | चिड़ीया , गाय , बकरी , तुम सब मेरी छाव में बैठो और आनंद लो अब मैं तुम सब के काम आ सकती हूँ  |
 

 

 

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