बसंती हवा

 

हवा हूँ , हवा मैं

बसंती हवा हूँ |

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सुनो बात मेरी –

अनोखी हवा हूँ|

 बड़ी बावली हूँ ,

बड़ी मस्तमौला |

नहीं कुछ फिकर है ,

बड़ी ही निडर हूँ |

जिधर चाहती हूँ ,

उधर घुमती हूँ |

मुसाफिर अजब हूँ |
हवा हूँ , हवा मैं ,

बसंती हवा हूँ |

 

चढ़ी पेर महुआ ,

थपाथप मचाया ,

गिरी धम्म से फिर ,

चढ़ी आम ऊपर ,

उसे भी झकोरा ,

किया कान में “कू”

उतरकर भागी मैं ,

हरे खेत पहुँचीं-

वहाँ ,गेहूँओं में ,

लहर खुब मारी|

 

हवा हूँ ,हवा मैं ,

बसंती हवा हूँ |

 

पहर दो पहर क्या ,

अनेकों पहर तक

इसी में रही मैं !

खड़ी देख अलसी

लिये शीश कलसी

मुझे खुब सूझी –

हिलाया –झुलाया

गिरी न पर कलसी

इसी हार को पा ,

हिलाई ना सरसों ,

झुलाई ना सरसों

 

हवा हूँ , हवा मैं ,

बसंती हवा हूँ ||

 

 

 

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