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पैसो का लालच

रामपुर गाव में  एक बुढिया घर घर जा कर अपने गाय की दूध बेचा करती थी और खुसी खुसी रहती थी |उसके तीन बहुए और पाच पोते और चार पोतिय थी |बुढिया को बहु बेटे ने अपने घर से अलग कर दिया था |फिर भी बुढिया के पास एक गाय पहले से थी जिसे वह दिन भर खिलाती पिलाती और खूब देख भाल करती | और घर घर जा कर गाय का दूध बेचा करती  | दूध से जो पैसा मिलता उससे वो अपना जीवन चलाती थी बुढिया बहुत चालक थी जब वह दूध बेच कर घर वापस आती तो रास्ते से थोरा थो? वह बोलती हर दिन दूध बेचती हु तो पैसा नहीं मिलेगा क्या|

बुढिया उस कंकर पत्थर को ला कर एक बक्से में रख देती| और एक बरे ताले से उस बक्से को

बंद कर देती और जब उसके पोते पोती पूछते की आप यह धन किसको  दोगी तो वह बोलती की जो मेरी सेवा करेगा उसको दूंगी| बस अब क्या था सब बच्चे अपने – अपने  माँ से जा कर बोलने लगे की अगर तुम दादी की सेवा करोगी तो वह पैसो से भरा बक्सा तुम्हे मिलेगा | अब सभी  बहुए चाहती थी की बुढिया मेरे साथ रहे | धीरे धीरे चालक बुढिया ने दूध बेच कर अपनी जिन्दगी अच्य से चलाती थी और कंकर से उस बक्से को भरती रही जब बक्सा भर गया तो बुढिया को रहत मिली | क्योकि वह जानती थी की आज कल के जमाने मे अगर धन बुढ़ापे में ना हो तो कोई पूछने वाला नहीं उस बुढिया को इतना पैसा तो नहीं होता था की वो उस पैसो में से कुछ बचा सके| किन्तु उसके पास भगवान् का दिया बुद्धि  तो था| इसलिए वह चिंतित हो कंकर ही सही अपनों के बेच रहने में  हमेसा लगी रहती | अब बुढिया का बटवारा कर लिया गया हर बहु बुढिया को अपने पास चार कार महिना रखेगी आब बुढिया अपने गाय और बक्से के साथ बहु के यहाँ रहने लगी | और बुढिया को बेहद प्यार भी मिलने लगा क्योकि उसके पास एक बक्सा था |अब सभी बहुए बुढिया को माँ ये खा लो माँ ये पहनलो | और इस प्रकार वो बुढिया अपने बुद्धि से सभी बहुए से सेवा करवाती थी |

एक दिन बुढिया बीमार हो गयी और इस संसार से चल बसी | अब सभी बहुए ने मिलकर जब उस बक्से को बटवारे के लिए खोला | और जब देखा की वह बक्सा पैसो की जगह कंकरों से भरा है | सभी बहुए हक्के बक्के हो गए |

शिक्षा ===>अपने माता पिता की केवल पैसो या अन्य स्वार्थ के लिए  सेवा नहीं करना चाहीये बल्कि निसवार्थ

सेवाकरनी चाहीये क्यों की स्वार्थ से सेवा करने वालो को कभी भी सेवा का फल नहीं मिलता|

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