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दूध और पानी की मित्रता

 

दूध ने पानी से मित्रता की और उसमें समा गया..|

जब दूध ने पानी का समर्पण देखा तो कहा मित्र तुम ने अपने स्वरूप का त्याग कर मेरे स्वरूप को धारण किया …|

अब मैं भी मित्रता निभाऊंगा और तुम्हें अपने भाव बिकबाऊंगा |

दूध बिकने के बाद जब उसे उबाला जाता है तब पानी कहता है …|

अब मेरी बारी है मित्रता निभाने का मैं तुम से पहले चला जाऊंगा | दूध से पहले पानी चला जाता है |

जब दूध मित्र को अपने से अलग देखता है , तो उफनने लगता है और उफन कर आग को बुझाने लगता है |

जब पानी की बूंदे उस पर छींट कर उसे अपने मित्र से मिलाया जाता है तब वह फिर शांत हो जाता है |

पर अगर इस अगाध प्रेम में……!

थोरी सी खटास – ( नींबू की दो चार बूंद ) डाल दी जाए तो दूध और पानी अलग हो जाता है |

और पुनः वापस अपने जीवन में नहीं मिलता ||

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सीख :- थोरी सी मन की खटास अटूट प्रेम को भी मिटा सकता है |  रिश्ते में खटास मत आने दो ||

“ क्या फर्क पड़ता हमारे पास कितने लाख , कितने गाड़ी, कितने घर हैं | खाना तो बस दो रोटी है ||

कविता :-  मैं रूठा , तुम भी रूठ गए फिर मनाएगा कौन ?

आज दरार है ,कल खाई होगी फिर भरेगा कौन ?

मैं चुप , तुम भी चुप इस चुप्पी को फिर तोड़ेगा कौन ?

बात छोटी को लगा लोगों के दिल से  , तो रिश्ता को फिर निभाएगा कौन ?

दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर , सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?

न मैं राजी  , न तुम राजी , फिर माफ करने का बड़प्प्न दिखाएगा कौन ?

डूब जाएगा यादों मैं दिल, तो फिर माफ करने का बड़प्प्न दिखाएगा कौन ?

जिन्दगी किसको मिली है सदा के लिये ?

फिर माफ करने का बड़प्प्न दिखाएगा कौन ?

मूंद ली दोनों में से किसी एक की आंखे …..

तो कल इस बात पर फिर पछताएगा कौन ?

 

 

 

 

 

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