चित्रकार की चालाकी

 

एक महाजन ने चित्रकार से अपना चित्र बनवाया | बड़ी मेहनत के बाद जब चित्र तैयार हुआ तो महाजन ने चित्रकार से कहा की ठीक से नहीं बना है , दुबारा बनाकर लाए |

 

चित्रकार फिर से चित्र बनाकर लाया किन्तु इस बार फिर महाजन ने पहले वाली हरकत की और चित्र को फिर से बनाकर लाने को कहा |

 

जब कई बार महाजन चित्रकार को परेशान कर चुका था तो चित्रकार से रहा न गया | वह समझ गया कि महाजन चेहरा बदलने में माहिर है |

अतः उसने अब तक बनाए गए  चित्रों का मेहताना माँगा |

 

कैसा मेहताना …..? जब मेरा चित्र बना ही नहीं तो मेहताना कैसा ?

“ एकदम सही चित्र बनाओं तो मेहताना भी मिल जाएगा |” धूर्त महाजन ने कहा |

 

वह बेचारा गरीब चित्रकार परेशान हो गया था | उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें क्या, न करें |

अतः वह चित्रकार, कल फिर से आने की अनुमति लेकर वहाँ से गया |

 

जब वह घर पहुँचा तो काफी परेशान था, उसने सारी बातें अपनी पत्नी को बताई |

 

उसकी पत्नी बहुत होशियार थी, वह तुरंत सारी बातें समझ गई |

 

वह अपने पति से बोली – कल आप एक बड़ा सा दर्पण लेकर महाजन के सामने जाना और कहना की आपका चित्र तैयार हो गया है |

चित्रकार भी अब अपनी पत्नी की सारी बातें समझ चुका था |

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एक दिन बाद चित्रकार महाजन के पास दर्पण लेकर गया और बोला –

“ आपका चित्र तैयार है”

 

“ पर यह तो दर्पण है” महाजन ने कहा |

 

“ यही तो असली चित्र है ”

 

“ तो क्या यह भी आपका चित्र नहीं है ”  चित्रकार ने कहा |

 

हाँ …… यह मेरा ही चित्र है |

अब महाजन समझ गया कि उसकी चालाकी पकड़ी जा चुकी है | और उसने चित्रकार को मेहताना देने में ही भलाई समझी | चित्रकार को उसकी पुरी मेहताना मिल गया | और वह ख़ुशी ख़ुशी अपने घर लौट आया |

 

सीख :- कभी कभी जहाँ बल काम न करें वहां अपनी बुद्धी का इस्तेमाल कर हम कठिन से कठिन काम को भी आसान कर सकतें हैं |

 

 

 

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