चाणक्य नीति

ईश्वर  (भाग -1)

  • किसी भी कार्य को करने से पहले देख लेना चाहिये कि उसका प्रतिफल क्या मिलेगा | यदि प्राप्त लाभ से बहुत अधिक परिश्रम करना परे तो ऐसे परिश्रम को न करना ही अच्छा है | माला गूंथने से , चन्दन घिसने से या ईश्वर की स्तुति का स्वयं गान करने से ही किसी भी मनुष्य का कल्याण नहीं हो जाता है | वे कार्य तो हर कोई कर सकता है, वैसे जिनका यह व्यवसाय है उन्हें ही शोभा देता है | अभिप्राय यह है मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो उसके लिए उचित व कम परिश्रम से अति फलदायक हो |

२)जिस व्यक्ती पर परमपिता भगवान विष्णु की कृपा हो उसके लिये तीनों लोक अपने ही घर के समान हैं | जिस पर प्रभु का स्नेह रहता है उसके सभी कार्य स्वंय सम्पन्न हो जाते हैं| अतः लक्ष्मी जिसके लिए माता स्वरूप और ईश्वर के भक्त बन्धु – बांधव हैं, उसके लिये , तीनों लोक ही निवास स्थान हो जाता है |

3)  जब परमपिता परमेश्वर भगवान विष्णु ही इस समस्त संसार का पालन पोषण करने वाला है तो मुझे अपने जीवन में किस बात की चिन्ता है | यदि परमेश्वर जगत का पालन हर न होता तो शिशु के जन्म लेते ही माँ के स्तन में दूध कैसे आ जाता है | हे यदुपते ! हे लक्ष्मीपते–त्रिभुवन के स्वामी आपके संसार के पोषक होने पर विश्वास करते हुए मैं आपके चरण कमलों में अपना सर्वस्व जीवन समर्पित करता हूँ | मैं आपके सेवा में सारा समय व्यतीत करता हूँ | मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मेरा भी यथोचितपालन पोषण करेगें |

4) कलयुग में  दस हजार वर्ष व्यतीत होने पर भगवान विष्णु धरती को त्याग देते हैं , पांच हजार वर्ष व्यतीत होने पर गंगाजल धरती को त्याग देते हैं | और ढाई हजार वर्ष व्यतीत होने पर ग्राम देवता ग्राम या धरती त्याग देते हैं |

5)जो व्यक्ती परम पिता परमात्मा में जड़ – चेतन ,सुख दुःख और लाभ हानि का दर्शन करते हैं ऐसे दिव्य व्यक्ती दूसरों की स्त्रियों को माता के समान , किसी अन्य के धन को मिट्टी के समान और हर प्राणी को अपने समान देखते हैं और समझते हैं आचार्य चाणक्य कहतें हैं कि सच्चे अर्थो में ऐसे व्यक्ती ही महान होते हैं |

 

 

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