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चाणक्य नीति

विद्या (भाग -2)

  • किंशुक के रक्त पुष्प तो देखने में तो खूबसूरत होते हैं | परन्तु उसमें गंध नहीं होता इसलिए अच्छे और आकर्षक रूप रंग के रहने पर भी गन्ध रहित होने पर भी उपेक्षित होते हैं | लोगों का ध्यान उनकी और आकर्षित नहीं होता और देवता के ऊपर चढ़ने से भी वंचित रहते हैं | इसप्रकार रूपवान युवक उच्च कुल जन्म लेने के पश्चात् रूपवान युवक विद्याहीन होने पर भी समाज से उचित आदर समान नहीं प्राप्त कर पातें हैं | विद्या के अभाव में उनका ऊँच- वंश, रूप – सौन्दर्य , यौवन सब के सब उपेक्षित हो जाते हैं | विद्या के अभाव में ये सब गुण किंशुक के पुष्प के समान निरर्थक हो जाते हैं |
  • आचार्य चाणक्य के मुताबिक विद्या कामधेनु गाय के समान है , कामधेनु के बारे में चर्चित है की वह सभी इच्छा पूर्ण करने वाली व सभी फलों की दाता थी | आज के युग में विद्या ही कामधेनु के समान है | विद्या गुप्त धन है ,जो न दिखाई देती और न ही इसका कोई विभाजन कर सकता है और उसका हरण भी सम्भव नहीं है प्रवास के समय यही विद्या व्यक्ती की सहायक होती है , जो की माँ के समान होती है वह कहतें हैं कि विद्या-सा आभूषण इस सम्पूर्ण धरती पर और कोई नहीं है | इस लिये व्यक्ती को सर्वप्रथम विद्या अर्जन पर ही ध्यान देना चाहिए |
  • जिस प्रकार दूध न देने वाली , गर्भ न धारण करने वाले गाय सर्वथा निरर्थक है | उसी प्रकार विद्याहीन और माता पिता की सेवा न करने वाला पुत्र भी सर्वथा अवांछनीय है | ऐसे पुत्र से किसी को कोई लाभ नहीं हो सकता है | ऐसे पुत्र से कोई लाभ नहीं हो सकता है | यहाँ आचार्य चाणक्य का कथन है कि गाय वही उतम होती है जो दूध देने वाली और गर्भ धारण करने वाली हो , ठीक उसी तरह पुत्र भी वही वांछनीय है जो विव्दान और माता – पिता का आज्ञकारी हो |
  • विद्या धन ही ऐसा धन है जो अनजाने देश में भी विद्वान् को सच्चा सहारा देता है | मित्र बना रहता है | नारी के सतीत्व ही घर में उसके आदर का कारण बना रहता है | रोगी का सच्चा मित्र उसका औषधि होती है | और मरने के बाद आत्मा को सद्गति देने वाला मनुष्य का सच्चा केवल धर्म होता है | जीवन में धर्माचरण करने वाला व्यक्ती ही मरने के बाद शांति और मोक्ष की प्राप्ति करता है |
  • विद्याध्यन कर रहे व्यक्ती के लिये आवश्यक है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसे-

 काम ( विषय – चिंतन ) ,क्रोध ( गुस्सा ), लोभ ( धन प्राप्ति की इच्छा ) , स्वाद ( जिव्हा को प्रिये लगने वाला प्रदार्थ का सेवन ) श्रृंगार ( सजना धजना) , कौतुल (खेल –तमाशे ,सिनेमा, टीवी ) अतिनिन्द्र ( अधिक सोना ) और अति सेवा (किसी की अधिक सेवा चाकरी करना) इन आठों बातों का त्याग कर देना चाहिय |  

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