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चाणक्य नीति ( भाग-५) नारी

 

 

नारी

  • कोयल की मीठी वाणी अर्थात उसका कर्णप्रिय स्वर ही उसका रूप है , कोयल भी कौए के समान काला और कुरूप होती है | परन्तु उसका स्वर लोगों के कानों को इतना मधुर और प्रिये लगता है कि वे उसके कुरूप होने की उपेक्षा करके , उसकी भद्दी सकल का ध्यान नहीं करके उससे स्नेह करने लगते हैं | इसी प्रकार स्त्रियों का सच्चा सौन्दर्य उसका पतिव्रता होता है , यदि रूपवती स्त्री चरित्रहीन है तो कोई शोभा नहीं पाती है | विद्या रूपहीन का रूप है , उसी प्रकार क्षमा तपस्वी का श्रृंगार है !
  • चाणक्य के महत्वपूर्ण कथनों में से यह एक है | नारी और पुरुष की समानता का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि नारी में पुरुष की अपेक्षा दो गुना भोजन करने की क्षमता होती है , जबकि लज्जा चार गुना अधिक पायी जाती है और साहस छह गुना अधिक होती है | नारी व पुरुष में कौन कितना उच्चा होता है यह तो गुणों के आधार पर ही तय होता है , किन्तु आचार्य चाणक्य का कथन है कि नारी पुरुष से उच्च ही होता है | चाहे मामला काम वासना का ही क्यों न हो – वह कहते हैं कि स्त्री में काम वासना पुरुष की अपेक्षा आठ गुना अधिक होती है |
  • आचार्य चाणक्य की कलम लिखती है कि नदी के तेज बहाव के कारण उसके तट पर खड़े वृक्ष नष्ट हो जाते हैं | उसी प्रकार जो नारी किन्ही भी कारणों से दूसरों के घर में रहती है वह सदैव ही लांछित ही होती , क्योंकि उसके लिए सतीत्व की रक्षा कठिन हो जाती है आर्थात नारी को दूसरों के घर में नहीं रहना चाहिए | इसी प्रकार से जिस राजा का कोई मंत्री नहीं होता है, वह भी विनाश के कगार पर रहता है | अतः उचित परामर्श एवं सहयोग के लिए राजा के पास मंत्री का होना आवश्यक है | ये सभी बातें मिथ्था नहीं वरन उपयोगी हैं , जिनका पालन करना हितकारी ही होता है |
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  • घर नारी से ही बनता है , किन्तु केवल नारी ही पर्याप्त नहीं , उसमें कुछ गुण भी होने चाहिएं | उसका स्वच्छ , कुशल और पवित्र होना वांछनीय है | पतिव्रता होना भी अनिवार्य है | पति के प्रति प्रेम –भाव न होगा तो वह पत्नी के कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकेगी | मन – वचन से सत्य बोलने वाली , अच्छा व्यवहार करने वाली होना भी श्रेष्ट गुणवती पत्नी के लिए बहुत आवश्यक है | ऐसी उक्त गुणों से सम्पन्न पत्नी को पाकर पति धन्य हो जाता है |
  • धर्म सबसे ज्यादा शक्तिशाली है , किन्तु बिना धन के धार्मिक अनुष्ठान भी पुरे नहीं होते | इसलिये धर्म की रक्षा करने के लिये धन वांछित है | विद्या की रक्षा प्राप्त ज्ञान अनुसार बार बार स्मरण करके ही होता है | राज्य सता की रक्षा के लिये नीतिवान एवं दयापूर्ण व्यवहार वांछित है तथा घर की रक्षा कुलीन स्त्री से ही होती है | चरित्रहीन स्त्री तो घर को नष्ट कर देती है | अभिप्राय यह है कि धन के अभाव में धर्म – कार्य भी नहीं पूर्ण होता , अनभ्यास से विद्या कंठस्त नही रहता , राजा के कठोर व्यवहार प्रजा रुष्ट हो जाती है | गृहपत्नी के चरित्रहीन होने पर कोई आँख उठा कर उस घर की और नहीं देखता |
  • इस संसार में मानव परवर्तियो की तरह ही सभी वस्तुओं के निर्मल होने की विधि भी अलग अलग है | कांसे का वर्तन राख से माँजने पर चमक उठता है | तांबे का पात्र इमली के पानी से धोने से निर्मल हो जाता है | स्त्री की देह रजस्वला होने के बाद स्वच्छ हो जाता है | शास्त्रों के अनुसार रजोदर्शन के उपरन्त स्नान से शुद्ध स्त्री ही सम्भोग और गर्भधारण के योग होती है | यही स्त्री की वास्तविक शुद्धी है | नदी की पानी भी तेज धारामें बहने के बाद स्वच्छ हो जाता है,
  • निर्धन तथा आजीवका पैदा करने में असमर्थ व्यक्ती बाबा बन जाता है , शक्तिहीन  पुरुष प्रायः ब्रह्मचारी बन जाता है | असाध्य रोगों से पीड़ीत व्यक्ती ईश्वर का भक्त बनकर साधना करता है | तथा बूढी स्त्री पतिव्रता बन जाती है | यह आज के युग में भी देखा जाता है | जबकि सामर्थ्य होने पर भी ब्रहमचर्य धारण करने , धन सम्पन्न होने पर भी विरक्त बनने , स्वस्थ होने पर भी ईश्वर– भक्त बनने तथा रूप यौवन से सम्पन्न रहने पर भी पतिव्रता धर्म का पालन करने का ही महत्व है |
  • पति की आज्ञा के बिना व्रत- उपवास करने वाली नारी अपने पति की आयु को घटाती है | इस पाप को करने के फलस्वरूप उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है | पतिव्रता नारी को चाहिए की वह अपने पति की आज्ञा का पालन करे | पति निर्देशानुसार उसे आचरण करना चाहिए | नीतिवान महापुरुष का कहना है कि भूखे मरने वाला व्रत नहीं करना चाहिए | अर्थ यह है कि यदि पत्नी के स्वास्थ का ध्यान करते हुए पत्नी को व्रत – उपवास करने से मना करता है तो पत्नी को हत नहीं करना नहीं चाहिए |
  • इस संसार में कोई भी नारी तरह तरह के दान करके , सैकरो व्रत करने , तीर्थ स्थानों में स्नान करने से भी वैसे पवित्र और शुद्ध होती जैसे अपने पति की सेवा करने से शुद्ध हो जाती है | नारी के लिये उसका पति की गति , प्राण , सम्पति ,धर्म ,कर्म काम और मोक्ष का साधन है | अर्थ यह है कि किसी सेवा से बढ़कर कोई फल दायक पूण्य कार्य नहीं है |
  • हर पदार्थ के अपने अपने गुण होते हैं | कुंदरू के सेवन से बुद्धि तत्काल नष्ट हो जाती है , किन्तु शरीर में असीम ताकत आ जाती है | इसके विपरीत वचा ( एक जड़ी ) के सेवन करने से शीघ्र बुद्धि विकसित हो जाती है | यह आयुवर्धक , वात , पित्त ,कफ नाशक होती है |

नारी शीघ्र ही शक्ति का हरण करने वाली होती है | और दूध के पिने से तत्काल ही खोई हुई शक्ति वापस आ जाती है | नारी का अत्यधिक संग करने से शीघ्र ही बुढ़ापा आ जाती है | इस से चाणक्य ने यह समझने का प्रयास की है कि तुन्दी बुध्दिनाशक और वचा बुध्दिवर्धक है | नारी शक्ति नाशक और दूध शक्ति वर्धक है |

 

 

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