चाणक्य नीति (भाग -४)

श्रेष्ट पिता

1). बुद्धिमान पिता का कर्तव्य है कि बच्चों को पांच वर्ष की आयु तक खुब लार – प्यार करे क्योंकि सन्तान का प्यार – दुलार से पालन करना तो माता – पिता की स्वाभाविक परवर्ती होती है | छह से पन्द्रह वर्ष तक बुरा काम करने पर दण्डित करना भी करना भी उचित है , क्योंकि यही अवस्था पढ़ने लिखने की , सिखने और चरित्र – निर्वाण करने की , अच्छी प्रव्रत्तियों को अपनाने की होती है | बच्चे को 16 वर्ष में आते ही उसके साथ मित्रवत व्यवहार करके कोई भी बात युक्ती पूर्वक समझानी चाहिए | कठोरता बरतने पर यह विरोध भी कर सकते हैं | और विद्रोही बनकर घर भी छोड़ सकते हैं |

2) प्रत्येक व्यक्ती जो भी अपने पुत्र को नीतिवान बनाता है , जो उसे श्रद्धालु बनाता है और जो शील का गुण पैदा करता है , वही व्यक्ती पुजनीय होता | आचार्य चाणक्य मार्गदर्शन करतें हैं कि माता –पिता का दायित्व बनता है कि बच्चों को संस्कारवान बनाये | उन्हें भले-बुरे का ज्ञान करायें | ऐसा तभी संभव है जबकि आप स्वयं संस्कारवान हो , क्योंकि बिना त्यग के फल प्राप्त नहीं होता है जो व्यक्ती बिना त्याग के फल की कल्पना करता है वह मात्र स्वप्न ही देखता है | इसलिए आवश्यक है कि बच्चों को संस्कारित तो करें किन्तु साथ आत्मावलोकन भी करें |

श्रेष्ट माता

3) राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी , मित्र की पत्नी, पत्नी की माता इन सब को अपनी माता के समान मानना चाहिए , इन्हें अपनी माँ के सामान ही आदर समान देना चाहिए , इनके रूप सौन्दर्य यौवन पर आसक्त होना , इनके प्रति कुद्रष्टि रखना पाप है | जो व्यक्ती ऐसा करता है , वह अपनी माता के साथ अनैतिक आचरण करता है | वस्तुतः राजपत्नी , गुरुपत्नी , मित्र की पत्नी , और सास माता के समान ही श्रध्देय है | इनका सदा सम्मान करना

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