चाणक्य नीति ( भाग -३ )

श्रेष्ट राजा

  • तप अकेले और एकांत स्थान में ही होती है | पढाई दो व्यक्तियों में होती है | दो से अधिक लोग होंगे तो बाते होगी पढाई नहीं होगी | गाना के अभ्याश के लिये तीन पर्याप्त हैं |और यात्रा के लिये चार अपेक्षित होते हैं | खेत बोने के लिये पांच व्यक्ती की आवश्यकता होती है | और युद्ध समय पर बहुतों की संख्या वांछनीय है |
  • राजा योगी और ब्राह्मन घूमते हुए अच्छे लगते हैं | राजा यदि अपने राज्य के दुसरे नगर में जाकर सम्पर्क बनाये नहीं रखता तो , उसका विनाश निशिचत ही है | प्रमादी राजा को सेवक कभी सही जानकारी नहीं देते | वे तो सदैव चपलुसी करते हैं | इसी प्रकार योगी एक रहने स्थान पर से आशक्ति में पर सकते हैं | जिससे उसका विरक्त भाव लुप्त होने लगता है | मोह माया में न फंसने के भाव से ही शास्त्रों में योगी तीन रात से अधिक एक स्थान पर न टिकने का निर्देश दिया गया है | ब्राह्मण भी यदि भ्रमण नही करता तो उसे नये यजमान भी उसके ज्ञान में नवीनता न पाकड़ तथा सदैव उसके मांगते रहने से प्रेषण होकर उससे विमुख हो जाते हैं |
  • मनुष्य के लिए राज्य से बाहर रहना अच्छा है किन्तु दुष्ट राजा के राज्य में रहना अनुचित है | मित्र का न होना ठीक है | परन्तु कुमित्र का संग सर्वथा अवांछनीय है | शिष्य न हो कोई बात नहीं परन्तु दुर्जन पुरुष को शिष्य बनाना उपयुक्त नहीं पत्नी विहिन होना अच्छा है पत्नी के बिना जीवन चल सकता है परन्तु किसी दुराचारिणी को अपनी पत्नी बनाना कदाचित उचित नहीं है क्योंकि इससे तो अपमान , अपयश और लोक निंदा को सहन करना परता है | अतः श्रेष्ट राजा के राज्य में रहना , सज्जन की संगती करना , योग्य पात्र को शिष्य बनाना और कुलीन पतिव्रता कन्या से विवाह करना सद्पुरुष की लिए वांछनीय है | यही सभी मनुष्य के लिये हितकर है |
  • जिस प्रकार अपने धर्म को छोड़कर दुसरे के धर्म का सहारा लेने से राजा का विनाश हो जाता है , उसी प्रकार जो मनुष्य अपने समुदाय को छोड़कर दुसरे के समुदाय का आश्रय लेता है तो वह स्वयं भी राजा के तरह ही नष्ट हो जाता है | कहने का अभिप्राय यह है कि बुद्धिमान लोगों को अपने लोगों को छोड़कर दुसरे लोगों को अपनाने की मुर्खता नहीं करनी चाहिए |

सद्पुरुष जैसा आचरण करतें हैं , इस संसार के साधारण पुरुष भी वैसा ही आचरण करते हैं | जिस बात को सद्पुरुष आदेश मानकर चलते हैं , संसार के मनुष्य भी उसी आदेश का अनुकरण करते हैं, इसी प्रकार राजा के पापी होने पर प्रजा भी पापाचार में लिप्त तथा राजा के उदासीन होने पर उसकी प्रजा व दरबारीगण सभी उदासीन हो जाते हैं |  मतलब कि प्रजा राजा का अनुकरण जैसे राजा वैसी प्रजा | कहने का अभिप्राय है कि जैसा राजा होता है उसकी प्रजा भी वैसे ही बन जाती है | जिस प्रकार अपनी प्रजा को सन्मार्ग दिखाने के लिए राजा को आदर्श पुरुष बनना अत्यंत आवश्यक है |

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