“कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना”

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एक युवक ने विवाह के दो साल बाद प्रदेश जाकर व्यपार करने की इच्छा अपने पिता से कही | पिता ने आज्ञा दे दी तो वह अपनी गर्भवती पत्नी को माँ के जिम्मे छोड़कर व्यपार करने चला गया |

 

प्रदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया और वह धनी सेठ बन गया | 16  वर्ष धन कमाने में बीत गए तब संतुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई |

माँ – पिता  को पत्र लिखकर  आने सुचना दी और जहाज में बैठ गया | उसी जहाज में एक व्यक्ति मिला जो बहुत दुखी मन से बैठा था | सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि – इस देश में ज्ञान का कोई केंद्र नहीं है | मैं यहाँ ज्ञान का सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है |

क्रोध

उस सेठ ने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई | तो उस व्यक्ति ने कहा कि मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्रएँ है |

सेठ को सौदा महंगा लगा …किन्तु फिर भी वह सौदा स्वीकार कर लिया |

उस व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया —  “कोई भी कार्य  करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना”

सेठ ने उस ज्ञान को अपने डायरी में लिख लिया |

कोई दिनों की  यात्रा के बाद सेठ रात्रि के समय अपने नगर को पहुंचा | उसने सोचा इतना दिन के बाद घर लौटा हूँ तो क्यों ना सुपके से बिना खबर दिए पत्नी को आश्चर्य का उपहार दिया जाए |

वह जब घर के अन्दर गया तो वहाँ का नजारा देखकर उसके पैर के नीचे की जमीन खिसक गई |

पलंग पर उसके पत्नी के साथ एक युवक सोया हुआ था !

अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि मैं प्रदेश में हर पल इसकी चिंता करता रहा और ये यहाँ अन्य पुरुष के साथ है | दोनों को जिन्दा नहीं छोड़ुंगा | क्रोध में तलवार निकाल ली |

वार करने ही जा रहा था कि उसे ज्ञान का वह सूत्र याद आ गया कि – “कोई भी कार्य करने से पहले मिनट सोच लेना चाहिए”

वह तलवार नीचे पटके बैठ गया | तलवार की आवाज से पत्नी की नींद खुल गई  और जैसे ही उसकी नजर अपने पति पड़ी वह अत्यंत खुश हो गई और बोली – आप के बिना जीवन सुना – सुना था इन्तजार में कई वर्ष निकल गये |

सेठ तो अत्यंत क्रोध में था पर कुछ नहीं बोला पत्नी ने उस युवक को उठाते हुए कहा – देखो बेटे तुम्हारे पिता जी आए हैं | युवक उठकर जैसे ही पिता जी की प्रणाम करने लगा उसके माथे से पगड़ी गिर गई और उसके लम्बे बाल बिखर गए |

सेठ की पत्नी ने कहा – स्वामी ये आपकी बेटी है | पिता के  बिना इसके कोई आंच ना आए इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान रखा , पालन पोषण और संस्कार दिए हैं |

यह सब बात सुन कर वह सेठ सन रह गया और उसके आखों से अश्रु धारा बहने लगा | पत्नी और बेटी को गले से लगाकर सोचने लगा | यदि क्रोध में आज मैं नहीं रुकता तो न जाने क्या हो जाता | मेरे हाथों से ही मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता |

सीख – इस कहानी का सार यह है कि – जीवन के दो मिनट जो दुःख से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं वे हैं –  “क्रोध के समय रुका हुआ वह दो मिनट”

 

 

 

1 Comment

  1. Pratibha.sonali

    sahi hai kisi bhi kaam ko karne se pahle sochana jaruri hai…..very nice story

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