आखिर हम क्यों असफल होते हैं ?

आखिर हम क्यों असफल होते हैं ?
इस प्रश्न का उत्तर अलग अलग सोचो के व्यक्ति अलग – अलग प्रकार से देते हैं | भाग्यवादी अपनी असफलता के लिए भाग्यहीनता को जिम्मेवार बताते हैं | कामजोर संकल्प का व्यक्ति विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों को जिम्मेवार मानता हैं |
दृढ संकल्प का व्यक्ति , अपनी असफलता के लिए स्वयं को जिम्मेवार मानते हैं | लेकिन मानव प्रवृति में स्वयं की कमियाँ देखने की आदत नहीं होती बल्कि वह हर असफलता के लिए किसी न किसी को दोषी ठहराना चाहता है |

 

सफलता हेतु जितने मेहनत की आवश्यकता होती है उतनी मेहनत अधिकांश लोग नहीं कर पाते हैं |

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अगर सफल व्यक्तयों की संख्या असफल व्यक्तियों से काम भी होती है तो जब भी सफलता , असफलता की चर्चा होती है, असफल व्यक्तियों की संख्या कम होने के कारण अधिकतर बात भाग्यहीनता पर आकर टिक जाती है |
ऐसे लोग स्वयं की असफलता हेतु बढ़ चढ़कर , ऐसी –ऐसी परिस्थितियों का बयान करते हैं  और एक सुर में भाग्य को कोशते हैं |

 

 

आप कभी गौर करें, की इस तरह की चर्चा में सफल व्यक्तियों द्वार कम तर्क दिए जाते हैं | उनके द्वारा ऐसी चर्चा में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया जाता है |

 

 

हमें भाग्य की सत्ता को नकारने की आवश्यकता नहीं है लेकिन भाग्य के कारण ही सफलता या असफलता मिल जाने की कल्पना करना अथवा ऐसी धारणा बनाना नितांत गलत है | व्यक्तियों को अपनी पुरुषार्थ पर विश्वास रखनी चाहिए |
एक कर्मठ मेहनतकश, संकल्पित व्यक्ति यदि असफल होता है तो उसे अपनी रीति – नीति का विश्लेषण करना चाहिए , अन्य की परिप्रेक्ष्य में स्वयं की तैयारी का आंकलन करनी चाहिए , यदि ये आंकलन सही से किया जाएगा तो आपको अपनी गलतियों का अनुभव हो जाएगा …||

“चाहे कुछ भी हो व्यक्तियों को ‘आशा’ का दामन नहीं छोड़ना चाहिए | रात के अन्धकार के बाद ,सुबह की किरणें अवश्य ही आती है” |

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